मंगलवार, 29 मई 2012

भ्रष्टाचार खत्म हो गया तो........ ?


जब-जब भ्रष्टाचार से मुकाबला करने की बात आती है तो हम एक ऐसे समाज की कल्पना करने लगते हैं जहां भ्रष्टाचार नाम का शब्द  ही न हो, लेकिन जब हम खुद  भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं तो इससे मुंह भी नहीं मोड़ पाते हैं। फर्क केवल इतना है कि जब हम स्वयं किसी काम को निपटाने के लिए अतिरिक्त साधनों का सहारा लेते हैं तो भ्रष्टाचार सुविधाओं को बटोरने का माध्यम बन जाता है और यदि कोई अन्य व्यक्ति उन सुविधाओं को आप से ज्यादा रकम खर्च करके हासिल कर लेता है और आप उस सुविधा से वंचित रह जाते हैं तो, उसी पल आपके लिए यह भ्रष्टाचार के रूप में समाज की सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। दरअसल भ्रष्टाचार का इतिहास बहुत ही पुराना है आप जिस भी विभाग में जाइए आपका काम तब तक नहीं बनेगा, जब तक कि आप पैसे खर्च नहीं करते हैं । आपको थाने में मानहानि की रिपोर्ट लिखानी हो, तो आपकी रिपोर्ट तब तक नहीं लिखी जाएगी, जब तक कि आप चाय पानी के लिए नहीं पूछते। बढिया ....  एक तो इज्जत गवांओं और ऊपर से रिपोर्ट लिखाने के लिए भी पैसे भरो। आपका फोन खराब है आप लाईनमैन को खुश करिए तभी आपका फोन सही होगा, अगर आपने लाईनमैन से यह कहा कि फोन सही करना उसकी ड्यूटी है तो, वह बहाने बना कर आपके फोन को और भी खराब बना देगा। आपको सरकारी अस्पताल में दिखाना हो, तो बावजूद सारी सुविधा के आपको दवाई नहीं मिलेगी और डॉक्टर तो आपको ऐसे घूरेंगें, कि जैसे आपने उनसे कुछ उधार लेकर दिया ही न हो। राशनकार्ड बनवाने,राशन लेने व घर की बिजली पानी की सारी सरकारी व्यवस्था के लिए भी या तो आप किसी उच्च अधिकारी से फोन कराईए या फिर रिश्वत दीजिए, क्योंकि ऊपर से लेकर नीचे तक सभी सरकारी विभागों के अधिकारी रिश्वतखोरी के अलावा कोई दूसरा काम कर नहीं सकते हैं।
ऐसी निराशाजनक स्थिति में भ्रष्टाचार के खिलाफ अवाज उठाना भी अपने जी का जंजाल बनाना है,जनता को धोखे में रखना है हाल ही के अन्ना समर्थन पर गौर कीजिए एक तरफ तो ईमानदारी से जीने के बड़-बड़े भाषण दिये जा रहे ह और दूसरी तरफ आपस में ही पॉकेटमारी से भी बाज नहीं आ रहे तो, भला किससे उम्मीद की जाए ईमानदारी के साथ शान से जीने की जनता से? अरे वह तो उन बंदरों की भूमिका अदा कर रही  हैं जो कि एक टोपी बेचने वाले की टापियां पहन-पहनकर पेड़ों पर जाकर बैठ गये और जब टोपी बेचने वाले ने अपनी टोपी उतारकर रख दी  तो सभी बंदरों ने भी अपनी-अपनी टोपियां उतारकर फेंक दी सो वही हाल यहां भी दिखाई पड़ रहा है, क्योंकि थोड़े दिनों की हाय-तौबा से तो भ्रष्टाचार देश से खत्म होने नहीं वाला है,अन्ना हजारे भी  उसी टोपी बेचने वाले का रोल अदा कर रहें हैं
अब आखिर भ्रष्टाचार के बिना हमारा काम भी तो नहीं चलता और अगर देखें तो वे राजनेता भला भ्रष्टाचार का खात्मा क्यों होने देंगें, जो इसी के दम पर अपनी अलकापुरी की नींव मजबूत कर रहें हैं। और वे सरकारी बाबू भला भ्रष्टाचार रूपी पेड़ को काटना क्यों पसंद करेंगें जिसके बूते वे अपनी तनख्वाह का दस गुना कमा रहे हैं,और आप व हम क्यों चाहेंगें कि भ्रष्टाचार देश से खत्म हो । चलिए कल्पना करते हैं कि यदि भ्रष्टाचार देश से खत्म हो जाए तो हमारी क्या स्थिति होगी जो इसे कोसते हैं लेकिन मौका मिलते ही इसका लाभ लेने से भी नहीं चूकते हैं । आप ट्रेन में सफर करते होंगें? कई बार ऐसा भी हुआ होगा कि बर्थ कन्फर्म नहीं हुई होगी, फिर भी निश्चिंत होकर बैठ जाते होंगें क्योंकि पता है कि टिकट चेकर कुछ पैसे लेकर बर्थ दे देगा, यदि सारे टिकट चेकर ईमानदार हो गए तो? कई लोगों के पास गैस कनेक्शन नहीं होगा और गैस ब्लैक में लेते होंगें यदि गैस डीलर गैस ब्लैक में देना बंद कर दे तो? आप दफ्तर में बीमारी के जाली सर्टिफिकेट दिखाकर छुटटी लेते होंगें यदि सारे डॉक्टर जाली प्रमाण-पत्र बनाना बंद कर दें तो? अब आपके पास गाड़ी तो होगी ही, और इसे चलाते हुए कभी ट्रेफिक रूल्स नहीं तोड़े क्या? कभी बच गए होंगें तो क भी फंस जाने पर कुछ ले-देकर छूट गए होंगें। सोचो कि वह ट्रेफिक पुलिस वाला आपका चालान करने पर आमदा हो गया होता तो? ऐसे और भी न जाने कितने मौके होंगें जब आपने भ्रष्टाचार का सहारा लेते होंगें और जाने-अनजाने यह सोचकर खुश हो जाते होंगें कि चलो कुछ रकम ही तो खर्च करनी पड़ी काम तो हो गया, वहीं दूसरे पहलु की तरफ गौर करें तो नतीजा यही निकलता है कि आज जिसकी लाठी उसकी भैंस का प्रचलन है यानी जिसकी ताकत उसकी सुविधाएं । अब जो पैसे वाला है वह रिश्वत देकर अपनी सीट कन्फर्म करा ली, दादागिरी करते हैं तो आंखे दिखाकर काम करा लिया,यदि राजनीति करते तो कल्याण ही कल्याण है,फिर ये सभी लोग जो येन -केन-प्रकारेण सारी सुविधाएं समेट लेना चाहते हैं वे भला भ्रष्टाचार का खात्मा क्यों होने देंगें,और हम आखिर हमें भी तो इसके साथ सहजता से जीने की आदत जो पड़ गई है।  

1 टिप्पणी:

  1. भ्रष्टाचार को हम सिर्फ पैसों के लेन-देन से ही क्यों जोड़कर देखते हैं। इसका सीधा-साधा अर्थ यानी भ्रष्ट आचरण, कई रूपों में हैं। असल में इसकी शुरुआत तो उसी वक्त से हो जाती है जब हम बच्चे से कोई काम कराने के लिए उसे टाॅफी का लालच देते हैं। यह भी तो भ्रष्टाचार ही है। काम बनाने के लिए भगवान को प्रसाद की रिश्वत से लेकर अन्ना के आंदोलन तक में भ्रष्टाचार है। यह क्या कम भ्रष्टाचार है कि अन्ना को हाइप देने वाले मीडिया के प्रति अन्ना द्वारा पेश किए लोकपाल में कोई बंधन नहीं था, जबकि मीडिया के भ्रष्टाचार की परतें भी ऐसा तो नहीं कि कम नुमायां होती हों।

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