मंगलवार, 15 मई 2012

रिश्तों की आड़ में खत्म होता जीवन............


 देहरादून की सामान्य गृहणी को उसके  इंजीनियर पति के  द्वारा अनगिनत टुकड़ों में काटकर फ्रिजर में रख दिया गया,नोएडा की एक फैशन डिजाइनर की उसके पति ने निर्मम हत्या कर दी,तो हाल ही में एक महिला ने अपने ही हाथों अपने सास ससुर पति व बच्चों को जहर देकर मार डाला।  आत्मीय  रिश्तों को तार-तार करने वाली ऐसी और न जाने कितनी घटनाएं आए दिन सामने आती रहती  हैं। क्या पढ़े लिखे समाज में इस तरह के दुस्साहस भरे कार्य हमें शोभा देतें हैं। अगर गौर करें तो कुछ ही दिनों पहले गुड़गांव के रुचि मर्डर केस पर भी काफी बवाल हुआ, जोकि काफी देर से सामने आया इनके अलावा और भी न जाने कितनी ही  ऐसी घटनाएं होती हैं, जो कभी सामनें भी नहीं आ पाती हैं। लेकिन अगर सोचा जाए तो कहीं न कहीं हर कत्ल के पीछे की वजह कोई न कोई रिश्ता होता हैं
 ऐसी घटनाएं न सिर्फ पति पत्नी के बीच ही नहीं होती हैं बल्कि बेटा बाप का, भाई बहन का अथवा और न जाने कितने ही रिश्तों में आज यूं बदले की भावना पनप रही है कि, व्यक्ति एक दूसरे का खून तक करने से नहीं चूकता हैं। आज यादि कहा जाए कि व्यक्ति का निजी जीवन भी ग्लोब्लाईज्ड हो गया है तो गलत नहीं होगा,इस भागदौड़ भरी जिंदगी में शायद रिश्तों की कीमतें शून्य हो गई है। जमीन जायदाद न मिल पाए तो, लोग अपने जन्मदाताओं, भाई या किसी अन्य परिवारिक सदस्य का कत्ल करने से गुरेज नहीं करतें हैं,
बालिग होने पर भी यदि कोई अपनी मर्जी से शादी कर ले तो उनकी जान पर बन आती है। पति पत्नी के  रिश्तें में यदि दौनों में से किसी की अन्य व्यक्ति से घनिष्ठता हो जाए तो बात, मारा मारी और हत्या तक पहुंच जाती है। क्या हम अपनी संकीर्ण सोच से अभी तक नहीं उबर पाए है या वाकई जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि  किसी लड़की द्वारा  पेम का प्रपोजल ठुकराए जाने पर उसकी जान लेने के लिए बंदूक की एक गोली काफी हैं । तुम उसके साथ क्यों चली गई,तुम पार्टी में उस व्यक्ति से बात क्यों कर रहीं थी बस इन्हीं बातों पर पति पत्नी के रिश्तें में एक दूसरे की नींदे हराम हो जाती हैं। यह सब अक्सर टीवी सीरियल व फिल्मों में अधिकतर देखने को मिलता है लेकिन जब हम इस सब से रूबरू होतें हैं तो यकीन आता है कि यह हकीकत आम जिंदगी से किसी भी तरह अलग नहीं है । किसी शादीशुदा इंसान के किसी और से लगाव हो जाने को अवैध संबंध करार देने में किसी को कोई परहेज नहीं होता। क्या आपसी व व्यक्तिगत जीवन में किसी को जगह देने का मतलब अपने निजी रिश्तों से मुंह मोड़ लेना है। क्या जरूरी है इन संबंधों का अंजाम एक दूसरे का खून हो? क्या ऐसा रास्ता नहीं ढूंढा जा सकता कि इन मसलों पर साथ बैठकर बात की जाए तथा इन समस्याओं का समाधान ढूंढा जाए। बात जब पति पत्नी के रिश्ते की ही हो रही है तो जरा सोचिए कि जो शुरूआत में एक दूसरे के साथ जीने मरने की कसमें खातें हैं वहीं कुछ दिनों बाद उसी रिश्तें में समाज के सामने एक दूसरे के प्रति प्रेम का दिखावा करने की नौबत क्यों आ जाती है।  क्या कोई फायदा है इस प्रकार से रिश्तों को ढोने का, जिन्हें परिवार या समाज को दिखाने के लिए खींचना पड़ रहा हो।
क्यों वे  अपनी झूठी शान के लिए साथ रहने या प्रेम करने का नाटक करते हैं? ऐसे मौकों पर कहां चला जाता है उनका प्यार, जो कहता था कि वे एक-दूसरे की खुशी के लिए जान भी दे देंगे। जब हम शादी करते हैं तो एक-दूसरे का साथ निभाने के साथ-साथ शायद एक-दूसरे को समझनें व  खुश रखने की भी कसम खाते हैं। लेकिन जब बात आती है उन आधारों पर चलने की तो  हम पीछे क्यों हट जाते हैं? शायद आज के समाज में इन बातों पर लोगों को विश्वास नहीं होता है शायद हम यह न जानतें हों कि एक खराब रिश्ता अपनी जिंदगी के साथ अन्य रिश्तों वआने वाली पीढ़ियों में भी दरार पैदा कर देता है। वहीं उन बच्चों पर क्या गुजरती होगी जिनके पिता ने उनके ही सामने उनकी मां का खून कर दिया हो या फिर किसी गहन विवाद के चलते माता पिता ने खुद को मौत के हवाले कर दिया हो। क्या बड़े होने पर उन बच्चों के जेहन में उन हादसों से जुड़े सवाल खड़े नहीं होतें होंगें ।
क्या इन सब में समाज का दोष नहीं है कि अपने आप को खुश रखने के लिए अलग हुई किसी महिला व अकेले रह रहे या फिर एक दूसरे के सम्मान हेतु तलाक होने पर भी हम किसी महिला व पुरूष को गिरी हुई नजरों से देखने लगतें हैं। क्या कोई अपने जीवन को सुख शांति से जीने के लिए रिश्तों रूपी बेड़ियों को नहीं तोड़ सकता। यह कौन सा न्याय है कि केवल रिश्तों की आड़ में आकर हम एक दूसरें के प्रति हिंसा व घृणा का शिकार होते हैं।  पति अपनी पत्नी का किसी और से बात करना या नजदीकी बर्दाश्त नहीं कर सकता क्योंकि यह उसके मेल इगो के खिलाफ है, एक पत्नी अपने पति का किसी और से अफेयर बर्दाश्त नहीं करती लेकिन वह इसे लेकर कोई बात नहीं करती है क्योंकि उसे डर है कि उसका पति उसे छोड़ देगा ,रिश्तों को तोड़ना सही नहीं है, पर क्या नजदीकी  रिश्ते में किसी का खून करना सही है? शायद जरूरी है कि हमें अपने  रिश्तों को लेकर पारदर्शी होना चाहिए और  सोचना चाहिए ताकि एक दूसरे को समझकर आने वाली जिंदगी में खुश रहा जा सके ।     

1 टिप्पणी:

  1. आपकी पोस्ट निश्चित ही इस सवाल की परिचायक है कि इन तमाम घटनाओं के पीछे वजह क्या है, आखिर ऐसा क्यो? आपकी ही पोस्ट इसकी वजह भी बयान करती है, पर कुछ बारीक चीजें और भी हैं। किसी और संदर्भ में अपनी एक लम्बी टिप्पणी लिखी थी, नीचे दिए लिंक पर उसे पढ़िए। शायद अपनी बात तब आप और बेहतर लिख सकें...
    http://khalishh.blogspot.in/2010/04/blog-post.html

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