बुधवार, 27 जून 2012

अकूत दौलत के मालिक ये मंदिर.....







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  शास्त्रों के अनुसार कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष माना जाता है  इसलिए कुबेर देव कितनी धन दौलत के मालिक होगें, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होगा। धन दौलत की स्थिति में भारत के कुछ मंदिर भी इसी स्थिति में हैं, यानी ये मंदिर बेहिसाब दौलत के मालिक हैं। भारत को देवी और देवताओं की भूमि कहा जाता है। यहां के मंदिरों के प्रति भी लोगों की गहन आस्था है।  यहीं नहीं मंदिरों में भक्तों द्वारा यहां के मंदिरों में भेंट की जाने वाली चीजों की कोई सीमा नहीं है, ईश्वर के प्रति इसी आस्था और सर्मपण के साथ यहां ईश्वर के भक्त अत्यंत कीमती चीजें तक दान करने से नहीं घबराते हैं । भारत के ऐसे ही पांच मंदिरों के बारे में आइए जानते हैं जिन्हें भारत के सबसे अमीर मंदिरों की श्रेणी में रखा गया है।

 पदमनाभस्वामी मंदिर केरल -

 श्री पदमनाभस्वामी मंदिर  भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व का सबसे अमीर मंदिर बन गया है। मंदिर से प्राप्त गहने जेवर कीमती  पत्थर आदि की कुल मूल्य का करीब एकलाख करोड़ रुपए का खजाना हासिल हुआ है  कुछ समय पहले तक सबसे अमीर मंदिरों की सूची में तिरूपति बालाजी के मंदिर को पहले पायदान पर रखा गया है, लेकिन केरल क पद्मनाभ मंदिर से मिले खजाने के बाद यह इस पायदान से नीचे आ गया है।  पद्मनाभ के मंदिर से करीब एक लाख करोड़ रूपए से ज्यादा का खजाना मिला है तथा इसका अभी एक तहखाना खोला जाना बाकी है जिसमें इस मंदिर की  प्राचीन वस्तुओं की कीमत को आंका जाएगा। गौरतलब है कि यह खजाना त्रावणकोर के राजाओं का है, कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह मंदिर बेशुमार दौलत का स्वामी है।

तिरूपति बालाजी -

 तिरूपति बाला जी मंदिर भारत के सबसे पवित्र व दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। यह दक्षिण भारत के प्रमुख तीर्थ के रूप में भी जाना जाता है। भक्तों द्वारा दिए गए चढ़ावे की दृष्टि से देखा जाए ,तो तिरूपति बालाजी पहले नंबर पर हैं।  इस मंदिर की वार्षिक आय 500 करोड़ रूपए से भी कहीं अधिक आंकी गई हैं। यहीं नहीं मंदिर की संपत्ति में करोड़ों रूपए के साथ ही हजारो  किलो सोना व चांदी भी शामिल है।  तिरूपति बालाजी की  संपत्ति के विषय में कहा जाता है कि यहां कुल  पचास हजार करोड़ की संपत्ति है। यह कहा जाता है कि  लोग यहां हीरे से भरे बैग तक भगवान वैंकटेश्वराय के चरणों में भेंट करते हैं । यही नहीं इस मंदिर के देवता करीब 1000 किलोग्राम गहने पहने हुए हैं । करीब 50,000 से एक लाख की संख्या में तीर्थयात्री हर दिन इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।

सिरडी साईबाबा-

 धन दौलत के मामले में सिरडी के सार्इं बाबा का मंदिर भी कुछ कम नहीं हैं। यहां भी प्रतिवर्ष करोड़ों का चढ़ावा आता है।  आंकड़ों के अनुसार यहां प्रतिवर्ष 400 करोड़ रूपए से भ अधिक का चढ़ावा आता है।   शिरडी का सार्इंबाबा का मंदिर महाराष्ट्र में स्थित भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों  में शामिल है। इस मंदिर  प्रयुक्त 24.41 करोड़ के सोने के साथ 3.26 करोड़ की चांदी व 6.12 लाख के चांदी के सिक्के व 1.288 करोड़ रुपए के सोने के सिक्कों व 1.123 करोड़ की कीमत के  गोल्ड पैंडेंट  शामिल हैं।

 सिद्धिविनायक मंदिर मुंबई-

श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर भगवान गणेश को समर्पित एक हिंदु मंदिर है। इस पवित्र तीर्थ  के लकड़ी के दरवाजों पर अष्टविनायक की छवियां सिने विजन से साथ खुदी हुई हैं। मंदिर के अंदर की छत के भाग पर सोने की परत चढ़ी हुई है। फिक्स डिपोजिट में इस मंदिर की वार्षिक आय 46 करोड़ रुपए से 125 करोड़ रुपए है।

 गोल्डन टेंपल अमृतसर-


 गोल्डन टेंंपल यानी स्वर्ण मंदिर सभी धर्मों खासकर सिक्खों के लिए पवित्र तीर्थस्थान है। यहां भक्तजन गुरूग्रंथसाहिब को कवर करने के लिए करीब 28,000 से 125,000 रुपए तक के रूमाल भेंट करते हैं। ये रूमाल  कीमती स्टोन से की गई  कशीदाकारी के साथ सिल्क रेशम और मखमल के बने होते हैं। अमावस्या संक्रांत दीपावली बैसाखी और गुरूपर्व जैसे अवसरों पर यहां तीर्थयात्रियों की संख्या अधिक होती है। मंदिर के अधिकारियों के अनुसार करीब एक से डेढ लाख व्यक्ति इन अवसरों पर इस मंदिर के दर्शन करते हैं। करीब 355,000 भक्तजन प्रतिदिन इस मंदिर में आते हैं।



गुरुवार, 14 जून 2012

नौकरी धरी कहां हैं........।


 घर से बाहर निकलने के बाद आदमी ऐसे काम भी कर जाता है, जो उसने कभी न किए हों। करता भी न हो लेकिन दिमाग में ख्याल तो पाल ही लेता है। हमारे लिए मॉर्निंग वॉक जैसी चीजें इसी श्रेणी में आती हैं। अभी कुछ दिनों पहले की बात है, हम एक कम आबादी वाले शहर के मकान की ऊपरी मंजिल में रह रहे थे हमारी तीन और सहेलियां हमारे बाजू वाले कमरे में रह रही थी अचानक एक दिन हमारी तीन सहेलियों ने वॉक पर जाने का मन बनाया। अरे हां, वॉक मतलब वहीं धीरे-धीरे चलकर बात करते हुए  सुबह या शाम के समय किसी पार्क अथवा सड़क के किनारे पर पर निकल पड़ना, यानी उनके विचार से हम सवेरे अपनी प्रेमप्यारी निद्रा को छोड़कर उनके साथ आस-पास तक टहलने जाएं। अब टहलने जाने के लिए तो सुबह उठना जरूरी है अब हमारी बला से कुछ हो जाए, मगर जब तक ख्वाबों के परिंदों हमारी आंखों के आशियानें से न उड़ जाएं तब तक क्या मजाल कि हम पलकें भी हिलाएं।
बिस्तर से सवेरे सवेरे उठना दरअसल हमे दुनिया का सबसे बड़ा अपराध लगता है। जिस बिस्तर ने हमें रात भर चैन की नींद सुलाया सुबह उठकर उसे झट से छोड़ देना हमें बहुत अखरता है। खैर, कई आखिरी करवटें बदलने के बाद आखिरकार फिर से वापसी का वादा कर बिस्तर से विदा लेनी पड़ती है।  जिस सुबह टहलने का वादा तय हुआ था वह भी आ गई हमें लगा कि कहीं कहीं हमने गलत बात पर तो  सहमति नहीं दे दी। तीनों सहेलियां कमरे में दाखिल हुर्इं एक ने हा,हा,हा करते हुए आईने के सामने बाल संवारना शुरू कर दिया, शायद उसे किसी बात पर हंसी आई होगी, हम नींद में सुन नहीं पाए। दूसरी हमें उठाने की जुगत  में थी, क्योंकि उसे पता था कि हम बजते हुए अलार्म को भी बंद करके कुभकरण की नींद सो जाते हैं। तीसरी जो थोड़ी सफाई पसंद थी ने रात भर से सिरहाने रखे चाय के कप को देखकर हमें भला बुरा कहना शुरू किया। दरअसल उस कप में चाय खत्म होने के बाद भी कुछ मिठास बची रह गई थी, चींटियां और झिंगुर उसका खुशी से आनंद ले रहे थे, अब उन्हें क्या मालूम था कि कोई उनके रंग में भंग भी कर सकता है और उन्हें बेरहमी से बाहर कर देगा। खैर,  उसने छी....भई हद है तुझसे तो, सुधर मत जाना यह कहते हुए कप को बाहर किया। हमारे कानों ने तो अपना काम शुरू कर दिया था मगर आंखें अभी खुलने का नाम नहीं ले रही थी फिर भी जबरदस्ती एक लंबी सांस भरते हुए हमने अपनी आंखे खोली और  दोस्तों से कहा कि तुम चलो हम अभी आते हैं। हमारी खुशनसीबी थी किसी ने हमारे साथ जबरदस्ती नहीं की। उन्हें जाता देख हम थोड़ा मुस्कुराए कि चलो अब दो मिनट और लेटे रहेंगें। लेकिन ज्यादा पीछे रह जाने के डर से हमने जल्दी से उठकर कोने में पड़े स्लीपर पहने और कमरे का दरवाजा लगा जल्दी से दोस्तों के दिशानिर्देश का पालन किया, ध्यान आया कि मोबाइल भूल गए बिना मोबाइल के बिना बाहर जाना हमें गंवारा नहीं क्योंकि हम उसी से फोटोग्राफी और दूरसंचार दौनों का कार्य लिया करते थे सो दोबारा दरवाजा खोलना पड़ा फिर लगाना भी पड़ा। सुबह सुबह इतनी मशक्कत दिमाग खराब करने के लिए काफी थी सीढ़ियों से उतरते वक्त दिखा कि तीनों काफी आगे निकल चुकी थी, सो हमने तेजी से पांव रखे और बाहर रोड पर पहुंचे गर्मी के मौसम की वजह से  सड़क के किनारे की मिटÞटी रेत में परिवर्तित हो गई थी। हमने थोड़ा तेज चलना चाहा तो पांवों में थोड़ी रेत भर जाने से कभी न गलने वाली प्लास्टिक वाली स्लीपर नाराज हो गई और पांव से सरक-सरक जाती।
 नकाब सरकने के बारे में तो शायरों ने न जाने कितना लिखा, पांव के नीचे से जमीन सरकने की बात भी लिखी गई मगर चप्पल सरकने की बात किसी ने नहीं लिखी। अब क्या आलम था हम ही जाने हमने तीनों को आवाज देकर रोका तब जाकर उनमें शामिल हो पाए। हमारी व्यथा सुनकर सभी ने हमपर ही दोष मढ़ना शुरू कर दिया किसी ने चप्पल बनाने वाली कंपनी और मैटिरियल पर अंगुली  नहीं उठाई। बस मन ऊब गया, सो मजबूरी में प्रकृति की हरियाली को निहारने का नाटक करते हुए कभी कभी उनकी बातों पर हां, हूं कर देते। उधर सूर्यदेव भी अपनी लालिमा लिए समान भाव से रोशनी बांटने के लिए आ पहुंचे जैसे किसी कंपनी में कोई कर्मचारी पहले दिन नए उत्साह और जोश के साथ अपनी ड्यूटी ज्वाईन करता है वह अलग बात है कि वह कुछ दिनों बाद हठी और कामचोर हो जाता है।
कुछ ही  दूरी पर एक चाय की दुकान थी साथियों का मन हुआ कि वहां बैठकर चाय पी जाए । वहां पहुंच गए देखा कि दो बुजुर्ग पहले से ही चाय की आनंद ले रहे थे। अखबार वाला भी बड़े तैश में अखबार ऐसे पटककर गया कि जैसे चायवाले ने उसका कितने महीनों का उधार न दिया हो। खैर, सबसे पहले हम अखबार की तरफ लपके पत्रकारिता से खास लगाव जो था भले ही नौकरी के लिए जद्दोजहद चल रही थी, मगर किसने गलत हैडिंग दिया है या किस अखबार में कितनी भाषाई अशुद्धियां हैं यह तो हम ऐसे बखान करते कि जैसे इन अखबारों के संपादक हम ही हों। अखबार कबूतर के पंखों की तरह वहां बैठे लोगों में एक एक पन्ना करके फैल गया। आज अखबार में  शहर की बिजली  के रात भर गुल रहने की खबर अहम थी। प्रधानमंत्री का विदेश दौरा रात भर से ही चर्चा का विषय बना हुआ था। आगरा में अपराध की घटना को सुनकर दौनों बुजुर्ग आगरा में इस तरह की घटनाओं से पर्यटकों की आमद घटने को लेकर काफी चिंतित दिखाई दिए। चाय बनकर तैयार हो गई थी। चाय फिर से उसी कभी न गलने वाली प्लास्टिक से बने गिलास में मिली थी जिससे बनी चप्पल हमारे पांवों से सरक-सरक जा रही थी हमें डर था कि कहीं चाय को छोड़कर न सरक जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दौनो बुजुर्ग ने किसी बात पर थोड़ी नाराजगी जताई ध्यान गया तो मालूम पड़ा कि उनका बेटा काफी पढ़ा लिखा है मगर उसे नौकरी नहीं मिली मतलब साफ था कि हमारी कैटेगिरी का ही होगा। थोड़ी देर में सड़क पर कुछ युवा लड़के-लड़कियां दौड़ लगाते हुए सड़क से होकर निकले।  उन्हें देखकर चाय वाले ने ताल लगाई कि जनाब सारे बालक उसी के यहां परांठा खाने आते हैं सब एमबीए और इंजीनियरिंग के विद्यार्थी  हैं। उन खिन्न बुजुर्ग से रहा न गया और बोले कि अब एमबीए कर लो या दौड़ लगाओ नौकरी धरी कहां हैं। चाय खत्म हो चुकी थी और हम चारों  वहां से वापस अपने कमरे पर पहुंचे याद आया कि आज दोपहर में एक इंटरव्यू के लिए जाना है। हम तैयार होकर जैसे ही बाहर पहुंचे तो सुबह बुजुर्ग व्यक्ति की कही बात याद आई कि नौकरी धरी कहां है.....?




शनिवार, 2 जून 2012

वो देती है गम हरदम ये जीन नहीं देती है..

 इक दर्दे-मोहब्बत है, इक बेरहम है ये दुनिया
वो देती है गम हरदम, ये जीने नहीं देती है

 इक राहे-फकीरी है, इक शोहरत-ए-अमीरी है
 इक सोने को तरसती है, इक सोने नहीं देती है

 इक हुस्न से नजदीकी, इक मां के आंचल की छांव
 वो जी भर के रूलाती है, ये रोने नहीं देती है

इक गैर से याराना और यारी में भी जख्म मिलें
इक करती है मरहम तो, इक सीने नही देती है

 ना पूछ मेरी सरहद, पी जाऊं समंदर को
 बस याद मगर उसकी मुझको पीने नहीं देती है।







यदि हम भगवान हाते तो..









कुदरत ने हर प्राणी को बड़े करीने से बख्शा है उसी के अनुरूप उसकी क्षमताएं भी निर्धारित की हैं.क्या आपने कभी सोचा है कि ईश्वर ने जिस प्राणी को जो भी दिया है या जैसी भी शक्ल दी है वह एकदम सटीक है. भगवान ने इंसान को जैसा बनाया है या फिर जैसी भी क्षमताएं दी हैं वह एकदम उचित है. चलिए इमैजिन कीजिए कि तोते बिल्लियों की शक्ल लेकर उड़ते,  खरगोश के सिर पर मुर्गे जैसी कलगी होती चिड़ियों का मुहं घोड़े जैसा होता या उल्लू लोमड़ी का मुहं लिए उड़ता। शेर का मुहं चिंपाजी जैसा होता या फिर  भेड़ की गर्दन आस्ट्रिच जैसी होती तो आप इन जानवरों को कैसे पहचानते और इन्हें क्या नाम देते। आप शायद कल्पना के संसार में खो गए  लेकिन जनाब हम इन कल्पानाओं को हकीकत का जामा पहना चुके हैं. जरा देखिए इन तस्वीरों को और कुदरत की अनमोल कारीगारी पर नाज करिए । कहीं भगवान ने हमारी गर्दन भी शुतुरमुर्ग जैसी ही बना डाली होती तो...............................