गुरुवार, 26 जुलाई 2012

वर्ल्ड फेमस कार्टून...

रोशनी के लिए...

जनसंख्या और भवष्यि..
 सरहदों की बंदिशें...
सुसाईड से पहले..

अथ रोड़वेज कथा यात्रा....



उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम अपनी कामयाबी की जिन ऊंचाईयों को छू रहा है। वह वाकई काबिले तारीफ है और यदि इसकी कार्यकुशलता की बात की जाए तो इसकी निपुणता का कोई सानी नहीं है। वहीं सेवा-भाव , तत्परता, समयबद्धता, विनम्रता व ईमानदारी जैसे तमाम अनुकरणीय गुण प्रदेश के परिवहन निगम में कूट कू ट-कर भरे हैं। यहां की बसें न केवल शानदार, बल्कि जानदर भी  हैं  और कर्मचारी वर्ग का तो जवाब ही नहीं। बसों की तो जितनी तारीफ की जाए उतनी ही कम है, इतनी नाजुक, खूबसूरत और नाज-नखरे वाली बसें कि डिपो से निकलकर दो-चार कदम चलते ही इनकी सांस फूलने लगती है। गलती इनकी नहीं है, दोष तो सड़कों का है। अब हिंदुस्तान की खटारा सड़कों पर भला ये लाजवंती नाजनीनें चलें  भी तो कैसे!
निगम के हालात भी बयां कर ही लेते हैं। आप निगम में पहुंचे नहीं कि जोर-शोर से आपका अतिथि सत्कार और आव भगत शुरू हो जाती है। यात्री प्रतीक्षालय में बैठे गन्नारस, चाय, टॉफी-बिस्कुट और कोल्ड ड्रिंक वाले पलकें बिछाए आपका इंतजार करते नजर आते हैं। अब अगर इनके सेवा भाव के कारण आपको बैठने या खड़े होने की जगह न मिले तो इसमें निगम का क्या कुसूर, इनके न होने का खामियाजा भी तो आप ही को भुगतना पड़ सकता है, इन्हीं की बदौलत तो आपको अपना सामान छोड़कर खाद्य सामग्री का इंतजाम नहीं करना पड़ता। निगम के प्रांगण में खड़े सांडों, सुस्ताते कुत्तों व पॉलिथीन चबाती गायों को आप भला कैसे भगा सकते हैं। जीवों पर दया करने का पाठ बचपन से ही आपको पढ़ाया जाता है, तब भला निगम इतना असहिष्णु कैसे हो सकता है।
 अब इंक्वायरी लिखे काउंटर पर किसी यात्री वाहन की जानकारी लेने के लिए आप वहां पधारें, तो पहले तो आपको परेशान करने के लिए वहां कोई मौजूद नहीं होगा। बेझिझक खड़े होकर आप वहां की शोभा को निहार सकते हैं और लकीली यानी भाग्यवश आपको कोई मिल भी गया, तो वह पहले तो आपको ऐसे प्रेम से निहारेगा, जैसे आपने उसका कुछ उधार लेकर वर्षों से दिया न हो। फिर वह आपको बिना डांटे-फटकारे, अदब में नीचे सिर झुकाए, तेजी से जो बताना है बता देगा, अब आपको समझ में न आए तो इसमें उसका क्या दोष! आपकी ही गलती है जो ठीक से नहीं सुन पाए।
आप बस में सवार हो जाइए। बस में चढ़ते ही आप चैं-पैं के शिकार हो जाएंगे। आपके बैठते ही चूरन, किताब, दंतमंजन, घड़ी व टार्च बेचने वाले बारी-बारी से अपनी लयबद्ध लेकिन ककर्श आवाज से आपका मनोरंजन करेंगे। अब भला ये नहीं होंगे, तो प्रस्थान के इंतजार में इतनी देर खड़ी रही बस में आपका एंटरटेनमेंट कैसे होगा। थोड़ी ही देर में आपको बस में इतने प्रेम से आगे या पीछे खिसकाया जाएगा, कि आपको यह रोडवेज की बस अपने गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते मां की गोद जैसा आराम देगी और आप शहर की सिटी बस के आराम को तो भूल ही जाएंगे। परिचालक ओवर लोडिंग थोड़े ही करते हैं, ये तो आप ही हैं जो दूर-दूर से उड़कर पतंगों की तरह बस स्टैंड पर आ पहुंचते हैं। अब परिचालक न बैठाकर पाप का भागी वह  क्यों बने!
 यदि आप महिला सीट पर किसी पुरुष को बैठा देखें, तो कृपया इसे अनैतिक न कहें, क्योंकि यह शब्द तो निगम के किसी कानून में है ही नहीं। बस के चालक व परिचालक के व्यवहार से तो आपको सीख लेनी चाहिए, चाहे वह चालक का अपने पड़ोसी वाहन चालकों को गाली देना हो या परिचालक का यात्रियों द्वारा खुले पैसे न देने पर बेअदबी से पेश आना हो। यहां तक कि कुछ दूरी के लिए बस में सवार एक महिला कांस्टेबल से हाथापाई करने तक की बात ही क्यों न हो। हां यह अलग बात है कि भले ही खाकी रंग के कपड़ो वाले उनके काकाजी एक रुपया दिए बिना कितनी ही दूर जा सकते हैं। आखिर यही तो सिखाते हैं कि ‘हक’ कैसे मिलता है। खैर, जो भी  हो, आपको अपनी यात्रा पर जाना है, फिर मिलेंगे, फिलहाल तो यही कहेंगे कि उत्तरप्रदेश परिवहन निगमश्री की इन बसों और कर्मचारियों के साथ  आपकी यात्रा मंगलमय हो।

सोमवार, 2 जुलाई 2012

क्या आप भी हिंदी प्रेमी हैं.........


 एक बार हम लखनऊ प्रस्थान करने के लिए मेरठ रेलवे स्टेशन पहुंचे, वहां पहुंचकर हमने टिकटमास्टर से कहा, 'हे यात्राधिकार प्रमाणपत्र प्रदायक महोदय', कृपया आप हमें लखनपुर प्रस्थान हेतु एक 'लोहपथगामिनि यात्राधिकार प्रमाणपत्र' प्रदान करने की कृपा करें। इतना सुनकर वह टिकट मास्टर हमें ऐसे घूरने लगा जैसे हम उससे किसी दूसरे ग्रह की भाषा में बात कर रहे हों और लखनपुर नाम का शहर इस हिंदुस्तान में हो ही न, वह बोला, क्या है हिंदी में बताओ ? फिर हमें अचानक चौथी कक्षा की पुस्तक का ख्याल आया और सोचा कि अरे लखनपुर का पूर्वनाम लखनावती था और बाद में लखनऊ कर दिया गया तथा 'यात्राधिकार प्रमाणपत्र प्रदाता' को टिकटमास्टर कहा जाता है। हमने फिर से टिकट कांउटर पर जाकर उस टिकट महाशय को लखनऊ की एक टिकट देने को कहा, तब जाकर उसने  बेरहमी से घूरते हुए हमें एक टिकट थमाई।
 टिकट लेकर में हम स्टेशन से बाहर आ गए और सोचा कि एक प्याला चाय पी ली जाए। चाय वाले की दुकान में प्रवेश कर हमने एक पात्र 'दुग्ध शर्करामिश्रित पेय पदार्थ' देने के लिए चाय वाले से कहा, तो वह बोला 'हमारी दुकान में नहीं है, बराबर में पूछ लो ।' हमने उससे पूछा कि 'आप यह क्या बना रहे हैं' तो वह बोला 'यह तो चाय है' हमने कहा कि 'हमे यहीं तो चाहिए' वह फिर से मुहं फेरकर अन्य लोगों को चाय देते हुए बोला कि 'इसे चाय या अंगे्रजी में टी कहते हैं, आप पता नहीं कौन सा नया नाम बता रहे हैं।' खैर, हमने अगर नहीं पूछा होता तो 'दुग्धशर्करामिश्रित पेय पदार्थ' ग्रहण करने के चक्कर में घूमते ही रहते चाय की दुकानों पर। चाय पीकर हमने आगे मार्ग की तरफ प्रस्थान कि या ।
ट्रेन के आने में अभी काफी समय था, इसलिए थोड़ा समय व्यतीत करने हेतु हम मार्ग की तरफ चल निकले, रास्ते में हमे याद आया कि हम घर से पान लेकर चलना भूल गए हैं और हमें खाने के बाद पान खाने की आदत है। हमने सोचा कि यहां कहीं से ले लेंगे, लेकिन हमें कोई दुकान नहीं दिखाई पड़ी। तभी हमारी नजर एक व्यक्ति पर गई, हमे लगा कि शायद वह व्यक्ति हमें पान की दुकान जरूर बता देगा। हमने उसके पास जाकर कहा कि श्रीमान 'क्या आप हमें इस विषय में अवगत करा सकते हैं, कि यहां  'तांबूल विक्रयशाला' किस दिशा में हैं? वह मुस्कुराते  हुए बोला, जी हां जरूर आप आगे आ गए हैं।  पीछे की ओर दाहिने हाथ पर मुड़कर थोड़ी ही दूरी पर है। वह। हम उसके दिशानिर्देशानुसार वहां पहुंचे तो  एक एक बड़ी सी इमारत पर 'महाराजा अग्रसेन धर्मशाला' लिखा पाया लेकिन वहां पान की दुकान दूर-दूर तक नहीं थी। उन श्रीमान की हंसी देखकर हमें लगा कि वह हमारी बात को समझ गए थे, लेकिन उन्होंने 'विक्रयशाला' को 'धर्मशाला' समझा होगा और हमें यहां भेज दिया।  ट्रेन के आने में भी काफी कम समय बचा था, सो हम बिना पान खाए ही वहां से चल दिए और स्टेशन पहुंच गए।
 स्टेशन पहुंचकर  हमें याद आया कि हमारा चश्मा हमारे पास नहीं था। यानी टिकट काउंटर पर ही  भूल आए थे। अब भूलते भी क्यों न हमें 'भुलक्कड़पन' की बीमारी विरासत में जो मिली थी। हम तेजी से भाग कर जैसे ही टिकट काउंटर पर पहुंचे तो टिकटमास्टर, जो हमसे  पहले ही काफी परेशान हो गया था ने हमें दूर से ही देखकर मुंह बना लिया, फिर भी उसे हम से बात करनी पड़ी। आखिर जनता की सेवा उसका फर्ज जो था और हम भी भला बिना चश्मा लिए कैसे चले जाते जबकि हमें मालूम था कि हमारा चश्मा वहीं रह गया था, सो फिर से पहुंच गए। हमने विनती स्वरूप हे श्रीमान ही कहा था कि वह तमतमाते हुए बोला 'अब कहां के लिए टिकट चाहिए, फिर आ गए दिमाग खाने को। हम बोले कि श्रीमान हमें टिकट नहीं चाहिए दरअसल, हम अपना 'कर्णस्थित नासिकाचिपकल दृश्ययंत्र' यहां 'त्रुटिवश' भूल गए थे। क्या आप हमें वह प्रदान करने की कृपा करेंगे। टिकट मास्टर हमें फिर से घूरते हुए अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। उसे हमारी कोई भी बात समझ में नहीं आई फिर वह बोला कि आपने अभी सबसे बाद में क्या कहा था कि भूल गए थे। भूल शब्द से टिकटमास्टर को याद आया कि हमारा चश्मा वहां रह गया था और वह चश्मा उठाकर हमें देने लगा और बोला  ये लो अपना चिपकल-सिपकल यंत्र, ऐनक कह देते तो भी समझ जाते हम सरकारी दफ्तर में बैठते हैं इतनी हिंदी तो जानते ही हैं।
 हम टिकट मास्टर का धन्यवाद करते हुए अपना चश्मा लेकर टिकट काउंटर से हटे तो सुनाई पड़ा कि हमारी ट्रेन  एक घंटा विलंबित है। हमने सोचा कि चलो इतने समय में हम अपने वहीं स्टेशन के नजदीक रहने वाले एक मित्र से मिल आएं। इसके लिए हमें एक रिक्शा की आवश्यकता महसूस हुई, क्योंकि समय की बचत भी करनी थी और मित्र से मिलकर वापस भी आना था। हम स्टेशन से बाहर आए तो एक रिक्शा वाले के पास जाकर कहा, हे श्रीमान 'द्विचक्रयान चालक' क्या आप हमें शिवविहार कॉलोनी तक छोड़ने की कृपा करेंगे। रिक्शा वाले ने चालक को चालाक समझा और हम पर चिल्लाते हुए बोला कि  चालाक तू और तेरा बाप।
  इतना कहकर वह आगे बढ़ गया। और हम हिंदी प्रेमी वहीं स्टेशन पर खड़े उसे दूर जाते ताकते रहे।हमें  अपने हिंदी प्रेमी होने पर शर्म आ रही थी क्या आप भी हमारी ही तरह हिंदी प्रेमी हैं।