सोमवार, 2 जुलाई 2012

क्या आप भी हिंदी प्रेमी हैं.........


 एक बार हम लखनऊ प्रस्थान करने के लिए मेरठ रेलवे स्टेशन पहुंचे, वहां पहुंचकर हमने टिकटमास्टर से कहा, 'हे यात्राधिकार प्रमाणपत्र प्रदायक महोदय', कृपया आप हमें लखनपुर प्रस्थान हेतु एक 'लोहपथगामिनि यात्राधिकार प्रमाणपत्र' प्रदान करने की कृपा करें। इतना सुनकर वह टिकट मास्टर हमें ऐसे घूरने लगा जैसे हम उससे किसी दूसरे ग्रह की भाषा में बात कर रहे हों और लखनपुर नाम का शहर इस हिंदुस्तान में हो ही न, वह बोला, क्या है हिंदी में बताओ ? फिर हमें अचानक चौथी कक्षा की पुस्तक का ख्याल आया और सोचा कि अरे लखनपुर का पूर्वनाम लखनावती था और बाद में लखनऊ कर दिया गया तथा 'यात्राधिकार प्रमाणपत्र प्रदाता' को टिकटमास्टर कहा जाता है। हमने फिर से टिकट कांउटर पर जाकर उस टिकट महाशय को लखनऊ की एक टिकट देने को कहा, तब जाकर उसने  बेरहमी से घूरते हुए हमें एक टिकट थमाई।
 टिकट लेकर में हम स्टेशन से बाहर आ गए और सोचा कि एक प्याला चाय पी ली जाए। चाय वाले की दुकान में प्रवेश कर हमने एक पात्र 'दुग्ध शर्करामिश्रित पेय पदार्थ' देने के लिए चाय वाले से कहा, तो वह बोला 'हमारी दुकान में नहीं है, बराबर में पूछ लो ।' हमने उससे पूछा कि 'आप यह क्या बना रहे हैं' तो वह बोला 'यह तो चाय है' हमने कहा कि 'हमे यहीं तो चाहिए' वह फिर से मुहं फेरकर अन्य लोगों को चाय देते हुए बोला कि 'इसे चाय या अंगे्रजी में टी कहते हैं, आप पता नहीं कौन सा नया नाम बता रहे हैं।' खैर, हमने अगर नहीं पूछा होता तो 'दुग्धशर्करामिश्रित पेय पदार्थ' ग्रहण करने के चक्कर में घूमते ही रहते चाय की दुकानों पर। चाय पीकर हमने आगे मार्ग की तरफ प्रस्थान कि या ।
ट्रेन के आने में अभी काफी समय था, इसलिए थोड़ा समय व्यतीत करने हेतु हम मार्ग की तरफ चल निकले, रास्ते में हमे याद आया कि हम घर से पान लेकर चलना भूल गए हैं और हमें खाने के बाद पान खाने की आदत है। हमने सोचा कि यहां कहीं से ले लेंगे, लेकिन हमें कोई दुकान नहीं दिखाई पड़ी। तभी हमारी नजर एक व्यक्ति पर गई, हमे लगा कि शायद वह व्यक्ति हमें पान की दुकान जरूर बता देगा। हमने उसके पास जाकर कहा कि श्रीमान 'क्या आप हमें इस विषय में अवगत करा सकते हैं, कि यहां  'तांबूल विक्रयशाला' किस दिशा में हैं? वह मुस्कुराते  हुए बोला, जी हां जरूर आप आगे आ गए हैं।  पीछे की ओर दाहिने हाथ पर मुड़कर थोड़ी ही दूरी पर है। वह। हम उसके दिशानिर्देशानुसार वहां पहुंचे तो  एक एक बड़ी सी इमारत पर 'महाराजा अग्रसेन धर्मशाला' लिखा पाया लेकिन वहां पान की दुकान दूर-दूर तक नहीं थी। उन श्रीमान की हंसी देखकर हमें लगा कि वह हमारी बात को समझ गए थे, लेकिन उन्होंने 'विक्रयशाला' को 'धर्मशाला' समझा होगा और हमें यहां भेज दिया।  ट्रेन के आने में भी काफी कम समय बचा था, सो हम बिना पान खाए ही वहां से चल दिए और स्टेशन पहुंच गए।
 स्टेशन पहुंचकर  हमें याद आया कि हमारा चश्मा हमारे पास नहीं था। यानी टिकट काउंटर पर ही  भूल आए थे। अब भूलते भी क्यों न हमें 'भुलक्कड़पन' की बीमारी विरासत में जो मिली थी। हम तेजी से भाग कर जैसे ही टिकट काउंटर पर पहुंचे तो टिकटमास्टर, जो हमसे  पहले ही काफी परेशान हो गया था ने हमें दूर से ही देखकर मुंह बना लिया, फिर भी उसे हम से बात करनी पड़ी। आखिर जनता की सेवा उसका फर्ज जो था और हम भी भला बिना चश्मा लिए कैसे चले जाते जबकि हमें मालूम था कि हमारा चश्मा वहीं रह गया था, सो फिर से पहुंच गए। हमने विनती स्वरूप हे श्रीमान ही कहा था कि वह तमतमाते हुए बोला 'अब कहां के लिए टिकट चाहिए, फिर आ गए दिमाग खाने को। हम बोले कि श्रीमान हमें टिकट नहीं चाहिए दरअसल, हम अपना 'कर्णस्थित नासिकाचिपकल दृश्ययंत्र' यहां 'त्रुटिवश' भूल गए थे। क्या आप हमें वह प्रदान करने की कृपा करेंगे। टिकट मास्टर हमें फिर से घूरते हुए अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। उसे हमारी कोई भी बात समझ में नहीं आई फिर वह बोला कि आपने अभी सबसे बाद में क्या कहा था कि भूल गए थे। भूल शब्द से टिकटमास्टर को याद आया कि हमारा चश्मा वहां रह गया था और वह चश्मा उठाकर हमें देने लगा और बोला  ये लो अपना चिपकल-सिपकल यंत्र, ऐनक कह देते तो भी समझ जाते हम सरकारी दफ्तर में बैठते हैं इतनी हिंदी तो जानते ही हैं।
 हम टिकट मास्टर का धन्यवाद करते हुए अपना चश्मा लेकर टिकट काउंटर से हटे तो सुनाई पड़ा कि हमारी ट्रेन  एक घंटा विलंबित है। हमने सोचा कि चलो इतने समय में हम अपने वहीं स्टेशन के नजदीक रहने वाले एक मित्र से मिल आएं। इसके लिए हमें एक रिक्शा की आवश्यकता महसूस हुई, क्योंकि समय की बचत भी करनी थी और मित्र से मिलकर वापस भी आना था। हम स्टेशन से बाहर आए तो एक रिक्शा वाले के पास जाकर कहा, हे श्रीमान 'द्विचक्रयान चालक' क्या आप हमें शिवविहार कॉलोनी तक छोड़ने की कृपा करेंगे। रिक्शा वाले ने चालक को चालाक समझा और हम पर चिल्लाते हुए बोला कि  चालाक तू और तेरा बाप।
  इतना कहकर वह आगे बढ़ गया। और हम हिंदी प्रेमी वहीं स्टेशन पर खड़े उसे दूर जाते ताकते रहे।हमें  अपने हिंदी प्रेमी होने पर शर्म आ रही थी क्या आप भी हमारी ही तरह हिंदी प्रेमी हैं।

1 टिप्पणी:

  1. भई ऐसी हिंदी से हर कोई तौबा करेगा। वैसे गाढ़ी उर्दू भी हास्य बन जाती है। रेलवे स्टेशन को हिंदी में क्या कहते हैं, यह पता चल जाता, तो बेहतर रहता। बहरहाल, लिखते रहो। लेकिन एक बात हमेशा से जो कही जाती है कि पढ़ते भी रहो, तो लेखन में और ज्यादा निखार आएगा।

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