गुरुवार, 20 सितंबर 2012

दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार की सर्वाधिक चर्चित ग़ज़ल ...

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है


एक चिंगारी  कही से ढूंढ लाओ दोस्तो
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है


एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है


एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है


निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है


दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

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