सोमवार, 11 मार्च 2013

क्रांति होने में समय लगता है

नका नाम इरोम शर्मिला है। घर में प्यार से उन्हें चानू कहा जाता है, तो उनकी अदभ्य साहस के चलते उन्हें ‘आयरन लेडी’ भी कहा जाने लगा। गांधीवाद में यकीन रखने वाली इरोम की जिंदगी एकाएक उस दिन बदल गई, जब सन 2000 में मणिपुर की राजधानी इंफाल से 10 किलोमीटर दूर मालोम गांव में 10 लोगों को उग्रवादी होने के संदेह में सुरक्षा बलों ने गोलियां चलाकर मार डाला। इरोम  को उस हत्याकांड ने इतना झझकोरा कि उन्होंने पूर्वोत्तर राज्यों में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) हटाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया। तमाम कोशिशों के बाद उन्होंने अपना अनशन खत्म नहीं किया तो उन्हें हिरासत में लेकर मुंह में नली डालकर उससे भोजन दिया जा रहा है। यह सिलसिला पिछले 12 साल से जारी है।
इरोम इस सप्ताह तब एक बार फिर चर्चा में आर्इं, जब दिल्ली की एक अदालत ने उन पर खुदकुशी करने के प्रयास के आरोप तय कर दिए। उल्लेखनीय है कि साल 2006 में अफ्सपा को हटाने को लेकर उन्होंने जंतर मंतर पर अनशन किया था, तब उन पर खुदकुशी करने के प्रयास की धारा 309 का मुकदमा दर्ज किया गया था। ऐसा नहीं है कि शर्मिला अकेली हैं। देश के लगभग आधा दर्जन मानवाधिकार संगठन उनके समर्थन में हैं। लेकिन जिस तरह से वह 12 साल से एक दमनकारी कानून को खत्म करने के लिए आमरण अनशन पर हैं, उसे देखते हुए उन्हें ज्यादा समर्थन नहीं मिल रहा है।
 शर्मिला ने पिछले बारह सालों से अपनी मां का चेहरा नहीं देखा है। वह कहती हैं कि मैंने मां से वादा किया था कि जब तक अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लूंगी, तब तक मुझसे मिलने मत आना। उनकी मां ने भी उन्हें अनशन पर बैठते समय ही आखिरी बार देखा था। वह नहीं चाहतीं कि मेरी बेटी मुझे देखकर कमजोर पड़ जाए और उसका मिशन अधूरा रह जाए। इरोम शांति चाहती हैं, हिंसा नहीं इसलिए वह अहिंसक तरीके से आंदोलन चलाकर अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं। विशेष कानून हटाने की उनकी दशक पुरानी मांग पर सरकार की धीमी प्रतिक्रिया के बारे में इरोम ने कहना है कि क्रांति होने में समय लगता है। मैं भी एक इंसान हूं, जो शांति एवं न्याय चाहता है।
40 साल की इरोम की लड़ाई कितनी लंबी चलेगी, कोई नहीं जानता। लेकिन वह उम्मीद करती हैं कि महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन की तरह चलाए जा रहे उनके आंदोलन भी भरपूर समर्थन मिले। उनका कहना है कि वह एक साधारण महिला हैं और जिंदगी से प्यार करती हैं। अपनी जिंदगी खत्म करना नहीं चाहती। उन पर खुदकुशी के आरोप भले ही तय कर दिए गए हों, लेकिन उनका हौसला टूटा नहीं है। वह अब कहती हैं कि मैं तब ही खाना खाऊंगी, जब अफ्सपा खत्म हो जाएगा, नहीं तो भोजन की नली फेंक दूंगी।

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