सोमवार, 13 मई 2013

आसमां भी मिल जाएगा उड़कर तो देख ...............


 अपने हालात- ए- जिंदगी से लड़कर तो देख
 आसमां भी मिल जाएगा उड़कर तो देख ।

 क्यों दुनिया से यहां-वहां लड़ता फिरता है
 खुद से आगे भी कभी निकलकर देख।

ठोकर खाकर उठ जाना कोई नई बात नहीं,
 गिर किसी नजर से फिर संभलकर तो देख।

 वक्त से आगे निकलना तो बड़ी बात हुई,
दो कदम वक्त के साथ ही चलकर तो देख।

 जो भी मिलता है हमें यूं लगे मिला है पहले भी,
 अनजान कहता है मगर इस दफ़ा मिलकर तो देख।

 तूने जिसे दीवार पर लगाई थी कभी अपनीतस्वीर,
 हो गए कितने ही दिन चलके वही घर तो  देख।

शनिवार, 11 मई 2013

भ्रष्टाचार के बीच शहर की चिंता


सलीम अख्तर सिद्दीकी
वह चाय की दुकान उस बिल्डिंग के पास थी, जहां शहर का विकास कराने वाले लोग बैठते थे। मैं भी उस बिल्डिंग में अपने किसी काम के लिए गया था। पता चला कि संबंधित बाबू अपने किसी मित्र के साथ चाय पीने गए हैं। मैं उनको ढूंढ़ता हुआ उस चाय की दुकान का हिस्सा बन गया था, जहां एक कोने में टीवी चल रहा था। उस दुकान पर बिल्डिंग में काम करने वाले कर्मचारी आते थे या मुझ जैसे लोग, जो कभी वक्त गुजारने के लिए, तो कभी संबंधित अधिकारी को ढूंढ़ते हुए पहुंचते थे। मैंने दुकान में चारों ओर नजर दौड़ाई, लेकिन वह अधिकारी मुझे कहीं नजर नहीं आए। मैंने उनका इंतजार वहीं करने का इरादा किया और वक्त गुजारी के लिए चाय का आॅर्डर दिया। मैंने वहीं एक सीट संभाली और टीवी पर चलने वाली खबरों पर ध्यान केंद्रित कर दिया। मेरी सीट के बराबर में ही दो सज्जन बैठे हुए थे। उनकी बातचीत से पता चल रहा था कि उनमें एक किसी वार्ड का पार्षद और दूसरा ठेकेदार था, जो पार्षद के इलाके में विकास कार्य करा रहा था। ठेकेदार पार्षद से किए गए काम को ओके कर देने का आग्रह कर रहा था। पार्षद का कहना था कि जब तक मेरा कमीशन नहीं मिलेगा, काम पास नहीं करूंगा। ठेकेदार का कहना था कि इलाके के लोगों ने घटिया काम नहीं होने दिया, इसलिए मुझे ज्यादा फायदा नहीं हुआ, तो कमीशन कैसे दे दूं। आखिरकार दोनों में सहमति यह बनी कि जितना कमीशन तय हुआ था, उससे आधा कमीशन दिया जाएगा और इसकी एवज में पार्षद काम पास कर देगा। दोनों के चेहरों पर इत्मीनान के भाव आए। एक बार फिर चाय का आॅर्डर दिया गया। दोनों ने अपना ध्यान टीवी पर चलने वाली खबरों पर लगा दिया। न्यूज चैनल हजारों करोड़ रुपयों के घोटाले का पर्दाफाश होने की खबर ब्रेक कर रहा था। पार्षद ने खबर पर प्रतिक्रिया दी, ‘देख लेना यह नेता देश को बेचकर खा जाएंगे।’ ठेकेदार ने गर्दन हिलाकर उसका समर्थन किया। मुझे दुकान में दाखिल हुआ, वह अधिकारी दिखाई दिया, जिसका मैं इंतजार कर रहा था। वह सीधा पार्षद और ठेकेदार के पास गया और बोला, ‘क्यों, हो गया आप दोनों को सेटेलमेंट?’ दोनों ने एक साथ गर्दन हिलाकर हां कहां। अधिकारी ने दोनों को नसीहत दी, ‘देखो मिलजुल कर काम निकला लेना चाहिए। इस काम में नुकसान हो गया, तो क्या आगे किसी काम में नुकसान पूरा कर लेना। हर क्षेत्र के लोग इतने जागरूक नहीं होते कि इस पर ध्यान दें कि उनके इलाके में काम कैसा हो रहा है?’ अधिकारी का ध्यान टीवी पर चलती हुई भ्रष्टाचार की खबर पर गया और बुदबुदाया, ‘पता नहीं इस देश का क्या होगा?’

क्लासिक कारों का शहर हवाना..........

 
आपने विंटेज कार रैली के दौरान पुरानी से पुरानी कारों को देखा होगा। लेकिन हवाना ऐसा अकेला शहर है जहां आप शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक 1940 या 50 के दशक की पुरानी अमेरिकी कारों में सफर कर सकते हैं। आपको जानकर हैरानी जरूर होगी मगर क्यूबा की राजधानी हवाना में विदेशी पर्यटकों को लुभाने के लिए वहां के टैक्सी ड्राइवर अमेरिकी कार, अमेरिकी कार की आवाज लगाते नजर 
आएंगे।

हवाना का आकर्षण हैं ये कारें 

दरअसल इतने पुरानी अमेरिकी कारों की सैर क्यूबा के सबसे ज्यादा लोकप्रिय आकर्षणों में गिनी जाती है। क्यूबा के स्थानीय लोग इन कारों को आहलमैनद्रोहनेह्स कहकर पुकारते हैं, जिसका अर्थ अंडाकार अखरोट होता है। अब यह नाम इन्हें क्यों दिया गया यह भी हम आपको जरूर बताएंगे। इन कारों के गोलाकार होने के कारण इन्हें यह नाम दिया गया। उस समय अधिकतर कारें  समुद्री जहाजों की तरह धीरे धीरे सड़क से गुजरा करती थीं। आपको ए कारें भले ही पुरानी लगें, मगर दुनिया भर में इन कारों के पशंसकों की भरमार है।

बची थी सिर्फ यही कारें

ए कारें क्यूबा में क्यों हैं, यह जानना भी जरूरी है। दरअसल फिदेल कास्त्रो के सत्ता में आने के बाद क्यूबा को सारी दुनिया से अलग कर दिया था। बाहर से वाहनों का आयात बंद हो गया था। ऐसे में पुरानी कारों का इस्तेमाल क्यूबा के निवासियों के लिए जरूरी हो गया था। क्यूबा में उस वक्त समय जैसे 1960 में ही ठहर गया था।

क्लासिक कारों का म्यूजियम

जो कार आपने कभी किसी पुरानी अंग्रेजी फिल्म में देखी होगी या किसी चित्र में देखी होगी, क्यूबा में आप उस कार के सफर का मजा हकीकत में ले सकते हैं। हवाना में प्लेमॉउथ शैवर्ले, ओल्ड्स मोबाइल, डोज, कैडिलैक जैसी पुराने मॉडल की ये गाड़ियां आपको सड़कों पर दौड़ती नजर आ जाएंगी। हवाना को एक अमेरिका कारों का संग्रहालय भी कहा जाता है, क्योंकि ए कारें काफी समय से हवाना के दैनिक जीवन का हिस्सा रही हैं।

नहीं मिलते कलपुर्जे भी

हवाना की सड़कों पर पर्यटकों के पर्यटन का मजा दोगुना करने वाली इन कारों को उत्पादन भी कब का बंद हो चुका है मगर हवाना की सड़कों पर ए कारें पचास वर्षों से भी ज्यादा समय से चल रही हैं। हालांकि वर्तमान में इन कारों के कलपुर्जे मिलना भी संभव नहीं हैं मगर फिर भी क्यूबा निवासी किसी न किसी तरीके से इनकी मुरम्मत करके या अन्य कारों के पुर्जे व इंजन की सहायता से इन्हें चला ही लेते हैं। इन कारों में अधिकतर कारों को अब टैक्सियों के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन फिर भी हवाना में पहुंचे पर्यटक इन कारों में सफर किए बिना वापस नहीं जाते हैं।

मजबूत इरादे के इमरान खान....

11 मई को दैनिक जनवाणी में प्रकाशित
उनका नाम इमरान खान नियाजी है। उन्हें लोग एक बेहतरीन क्रिकेटर के रूप में पहचानते हैं। लेकिन इससे इतर उनकी नई पहचान एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता की भी बनी है। वह आजकल इसलिए चर्चा में नहीं हैं कि वह एक चुनावी सभा के दौरान लिफ्ट से गिरकर उसी अस्पताल में भर्ती हैं, जो उन्होंने अपनी मां शौकत खान की याद में लाहौर में बनवाया था, बल्कि इसलिए हैं कि क्रिकेट के मैदान में मजबूत इरादों से अपनी टीम को जिताने वाले वाले इमरान कड़े संघर्ष के बाद राजनीति में भी मजबूत बनकर उभरे हैं। एक चुनावी सर्वे कहता है कि वह पाकिस्तानी अवाम के दूसरे सबसे ज्यादा पसंदीदा राजनेता बनकर उभरे हैं।
शौकत खानम और इकरमुल्लाह खान नियाजी के पुत्र इमरान युवावस्था में शांत और शर्मीले थे। उन्होंने लाहौर में ऐचीसन कॉलेज कैथेड्रल स्कूल और इंग्लैंड में रॉयल ग्रामर स्कूल वर्सेस्टर में शिक्षा ग्रहण की। 1972 में उन्होंने केबल कॉलेज आॅक्सफोर्ड में दर्शन राजनीति और अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए दाखिला ले लिया, जहां उन्होंने राजनीति में दूसरा और अर्थशास्त्र में तीसरा स्थान प्राप्त किया था। 16 मई 1995 में उन्होंने जेमिमा गोल्डस्मिथ को शरीक-ए-हयात बनाया। दोनों की शादीशुदा जिंदगी ज्यादा दिन नहीं चल पाई। इसकी वजह यह थी कि जेमिमा पाकिस्तानी माहौल में अपने आपको नहीं ढाल पार्इं। 2004 में दोनों के बीच अलगाव हो गया।
वह 1971 से1992 तक पाकिस्तान क्रिकेट टीम के लिए खेले। 39 वर्ष की आयु में उन्होंने पाकिस्तान की प्रथम और एकमात्र विश्वकप जीत में अपनी टीम का नेतृत्व किया था। 1992 में क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद उन्होंने अपना लक्ष्य सामाजिक कार्य को बना लिया। अपनी मां शौकत खानम के नाम पर ट्रस्ट की स्थापना वह 1991 में ही कर चुके थे। उन्होंने ट्रस्ट की ओर से पाकिस्तान को पहला और एकमात्र कैंसर अस्पताल दिया। इसके निर्माण के लिए उन्होंने दुनियाभर से पैसा जमा किया।
25 अप्रैल 1996 को इमरान खान ने न्याय, मानवता और आत्म सम्मान के नारे के साथ पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी पीटीआई नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी की स्थापना की। शुरुआती दौर में उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। इसीलिए पिछले आम चुनाव में उनके सभी उम्मीदवार हार गए थे। मजबूत इरादों के इमरान खान ने हिम्मत नहीं हारी और मुसलसल जद्दोजहद के बाद उन्होंने राजनेता के रूप में अपना कद लगातार बढ़ाया। उनके समर्थकों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। उनके समर्थकों में महिलाएं और युवा हैं, जो यह सोचते हैं कि इमरान खान पाकिस्तान को उन झंझावतों से निकालने में सक्षम हैं, जिनसे पाकिस्तान आज दो-चार है।