शुक्रवार, 7 जून 2013

खतरे में राष्ट्रीय पहचान

अगर आपसे पूछा जाए कि हमारा राष्ट्रीय पशु क्या है, तो जवाब में टाइगर का नाम लेते समय आपका सीना भी गर्व से चौड़ा हो जाता होगा। मोर का नाम भी आप बड़े गर्व से लेते हैं, क्योंकि इसका नाम भी हमारे राष्ट्र के साथ जुड़ा है। मगर क्या आपको मालूम है कि ऐसे जो भी नाम हमारे राष्ट्र की पहचान के साथ जुड़े हैं, उनकी हालत अच्छी नहीं है। हॉकी हमारे देश का राष्ट्रीय खेल है, लेकिन अपने ही देश में वह गुमनामी की हालत में है। हमारी राष्ट्रीय नदी गंगा हो या मीठे जल में पाई जाने वाली प्यारी डाल्फिन, दोनों का ही जीवन खतरे में है। हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है, लेकिन अपने ही देश में हिन्दी बोलने वालों को उतना सम्मान नहीं मिलता जितना अंग्रेजी बोलने वालों को। आखिर राष्ट्र की पहचान के साथ हो रहे इस खिलवाड़ को हम क्यों सहन कर लेते हैं? क्या वजह है कि जो नाम हमारे राष्ट्र की पहचान के साथ जुड़े हैं, उनकी अनदेखी होती है? राष्ट्र की पहचान के साथ हो रहे खिलवाड़ पर पेश है एक रिपोर्ट...
मारे देश में महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा हासिल है। लेकिन इसी मुल्क में कुछ ऐसी भी ताकते हैं, जो उनके विचारों के साथ खिलवाड़ करती हैं और उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं होती? ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ जैसा मुहावरा भी हमारे देश में ही प्रचलित है? गांधीवाद का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है? जिस गुजरात का साबरमती आश्रम सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है, उसी राज्य में एक समुदाय विशेष को टारगेट कर नरसंहार किया जाता है और पीड़ित आज भी न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। ब्रिटेन में बापू के सामान की नीलामी होती है और हमारे देश के हुक्मरानों के सिर पर जूं तक नहीं रेंगती।
इसी तरह हमारे देश का राष्ट्रीय खेल हाकी है, लेकिन मुल्क के ज्यादातर बच्चे इसके खिलाड़ियों के नाम तक नहीं जानते। आज यह एक उपेक्षित खेल बनकर रह गया है। वहीं क्रिकेट जो कि एक विदेशी खेल है और जिसका कमोवेश हर खिलाड़ी करोड़पति है, सट्टेबाजी में डूबा हुआ है, लेकिन इस खेल से जुड़े खिलाड़ियों को हमारे देश में सबसे ज्यादा सम्मान मिलता है। कुल मिलाकर भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों की खस्ताहालत के बारे में जितना भी लिखा जाए, कम है। हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों पर दुनिया भर में बसे हुए अलग-अलग पृष्ठभूमि के भारतीय गर्व करते हैं। ए प्रतीक हर भारतीय के दिल में गौरव और देशभक्ति की भावन का संचार करते हैं, लेकिन इन राष्ट्रीय प्रतीकों का संरक्षण भी आज उतना ही जरूरी है।

किताबों में ही नाचेगा मोर

मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। अपने खूबसूरत पंखों के कारण यह जगत प्रसिद्ध है। मोर की पूंछ में करीब 200 लंबे पंखों का बेहद सुंदर गुच्छा होता है। नर मोर मादा से अधिक खूबसूरत होता है। इसकी पूंछ ब्रांज-ग्रीन रंग की होती है। यही खूबसूरत पंख पाने के लिए शिकारी इस राष्ट्रीय पक्षी का शिकार करते हैं। फसलों को नुकसान से बचाने के लिए भी कई स्थानों पर मोरों को जहर देकर मार दिया जाता है। इन सब वजहों से मोरों की दिन-प्रतिदिन घटती संख्या आज चिंता का विषय बन गई है। कौशांबी में धुमाई के जंगलों में  हजारों की तादाद में मोर हैं। जंगल में तालाब हैं, मगर गर्मी के दिनों में तालाब सूख जाते हैं। इस कारण भीषण गर्मी में प्यास से बड़ी संख्या में मोरों की मृत्यु हो जाती है। 2009 में भीषण गर्मी के कारण ही यहां करीब सौ से भी अधिक मोरों की मृत्यु हो गई थी। हमारे यहां मोर को  धार्मिक मान्यता प्राप्त है। यह एक राष्ट्रीय पक्षी भी है। इसकी सुरक्षा के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 भी बनाया गया, जिसके बाद यदि कोई मोर का शिकार करता है, तो उसे जेल भी हो सकती है, बावजूद इन सबके अभी भी आए दिन मोरों के मारे जाने की खबरें सुनाई पड़ती हैं।

कैसे देखेंगे डॉल्फिन डाइव्स

डाल्फिन हमारा राष्ट्रीय जलचर है। यह शुद्घ और मीठे पानी में ही जीवित रह सकती है। यह बहुत समझदार जीव है और बहुत जल्दी मनुष्यों से घुलमिल जाती है। शिकार और प्रदूषण के चलते डॉल्फिन पर भी खतरा मंडरा रहा है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत डॉल्फिन का शिकार करना और इसे नुकसान पहुंचाना भी एक आपराध है। आरोपी को जेल भी हो सकती है। गंगा में पाई जाने वाली समझदार और शांत डॉल्फिन के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2009 में भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय जलचर का दर्जा दिया था। असम सरकार ने इसे 2008 में ही राजकीय जलजीव घोषित कर दिया था। डॉल्फिन के शिकार पर यूं तो 1972 से ही प्रतिबंध है, मगर फिर भी इसकी संख्या में वृद्धि नहीं हो पाई। 435 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र के चंबल अभयारण्य में केवल 108 डॉल्फिन ही शेष हैं। चीन जापान और कोरिया में दवाओं के रूप में इसके उपयोग ने डॉल्फिन पर मंडराते संकट को और भी गहरा दिया है। इसकी चर्बी से तेल निकाला जाता है जिसके कारण इसकी मांग कोरियाई देशों में हमेशा बनी रहती है। यही कारण है कि यह अवैध तस्करी का हिस्सा भी बन गई है। वन अधिकारियों की देखरेख में गंगा से लेकर चंबल तक की सहायक नदियों में डॉल्फिन की गिनती शुरू की गई है, लेकिन इनकी संख्या अभी तक तय नहीं हो पाई है। 

प्रदूषण की भेंट चढ़ती गंगा

गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी होने के साथ ही राष्ट्रीय नदी भी है। हिमालय स्थित गंगोत्री से उत्पन्न गंगा पहाड़ों, घाटियों और मैदानों में 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती है और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। गंगा के किनारे कई तीर्थ हैं, जहां करोड़ों श्रद्धालु पूजा पाठ करते हैं। गंगा कई राज्यों के लिए जीवनदायनी नदी है, मगर बढ़Þते प्रदूषण के कारण यह अब कचरे की नदी में तब्दील होती जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक प्रतिदिन 1.3 अरब लीटर अपशिष्ट गंगा में बहाया जाता है, साथ ही गंगा के आसपास की फै क्ट्रियां भी इसे प्रदूषित कर रही हैं। प्रतिदिन लगभग 260 मिलियन लीटर औद्योगिक अपशिष्ट गंगा में प्रवाहित होता है। पिछले दिनों वाराणसी में हुए एक निरीक्षण के दौरान 100 मिलीलीटर जल में 50 हजार हानिकारक जीवाणुओं की संख्या पाई गई, जो नहाने के पानी के लिए सरकारी मानकों से 10 हजार प्रतिशत ज्यादा थी। गंगा को स्वच्छ करने की योजना के अंतर्गत वर्ष 1985 से 2000 के बीच गंगा एक्शन प्लान एक और दो के क्रियान्वयन पर सरकार लगभग एक हजार करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है, मगर गंगा अब भी प्रदूषण की गिरफ्त से नहीं छूट रही है। गंगा में मछलियों की करीब 140 प्रजातियां पाई जाती हैं। प्रदूषण की वजह से ए भी विलुप्त होती जा रही हैं।

2022 तक खत्म हो सकते हैं बाघ

बाघ को शाही बंगाल टाइगर भी कहा जाता है। फुर्तीले व अपार शक्ति के कारण बाघ शक्ति का प्रतीक है। इसे भारत का राष्ट्रीय प्रतीक होने का गौरव हासिल है। आठ किस्मों में से शाही टाइगर उत्तर पूर्व को छोड़कर भारत के पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, भूटान और बांग्लादेश में भी पाया जाता है। भारत के राष्ट्रीय पशु बाघ को बचाने के लिए अप्रैल 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर परियोजना शुरू की गई थी। अब तक इस परियोजना के अंतर्गत 27 बाघ के आरक्षित क्षेत्र भी बनाए गए, जिनमें 37,761 वर्ग किमी का क्षेत्र शामिल हंै। इस समय देश में 1706 बाघ मौजूद हैं, जिसमें 235 उत्तराखंड में हैं। वाइल्डलााइफ संस्था का अनुमान है कि दुनिया भर में अब केवल 3,200 बाघ ही बचे हैं। वैसे सबसे ज्यादा बाघ भारत में हैं। संस्था के मुतबिक अगले 12 वर्ष के भीतर दुनिया से बाघों का अस्तित्व मिट सकता है। स्वीडन की एक संस्था 2022 तक बाघों की संख्या को बढ़Þाने का प्रयास कर रही है।

कमल को दलदल की तलाश

हिंदु मान्यता के अनुसार कमल धन की देवी लक्ष्मी का प्रिय फूल है। यह कीचड़ में खिलता है, जो यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थिति में भी अच्छे कार्य हो सकते हैं। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में एक ध्वज में आठ कमल के फूलों का प्रयोग किया गया, जो आठ राज्यों का प्रतिनिधित्व करते थे। यही कारण है कि इसे भारत के राष्ट्रीय फूल के रूप में स्वीकार किया गया है।  यह पुष्प भी दलदलीय यानी नम भूमि में ही उगता है। लगातार नम भूमि की हो रही बर्बादी के कारण इस राष्ट्रीय फूल पर भी खतरा मंडराने लगा है।

 कहानी न बन जाए बरगद

सभी पेड़ों से हटकर बरगद हमारा राष्ट्रीय पेड़ है। इस पेड़ की नीचे की ओर जाती और जमीन में धंसी जटाएं अपने गौरवशाली इतिहास से जुड़े होने का संदेश देती हैं। इसकी शाखाएं हमेशा परिवर्तन और विकास के लिए प्रेरित करती हैं। बरगद सबसे लंबी उम्र वाला वृक्ष है। दुनिया का सबसे विशाल और उम्रदराज बरगद कोलकाता का द ग्रेट बनियान है। इसकी उम्र 250 साल बताई जाती है। राष्ट्रीय पेड़ होने के नाते बरगद को भी इसी तरह संरक्षण की आवश्कता है, जिस प्रकार अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों की, क्योंकि  बढ़Þने, जमीनी दोहन आदि के चलते बरगद के नए पेड़ों को उगाना काफी मुश्किल है। बरगद के पेड़ को बढ़Þने के लिए बड़ी भूमिका की आवश्यकता होती है, मगर मानव की जरूरतों के चलते इतनी भूमि मुश्किल से ही बच पाती है। ए फलते-फूलते बरगद या तो काट दिए जाते हैं या नष्ट कर दिए जाते हैं।

राष्ट्रभाषा की चिंता

भले ही हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी दुनिया में बोली जाने वाली भाषाओं में दूसरे स्थान पर हो, मगर धीरे-धीरे यह अपनी धाक खोती जा रही है। 14  सितंबर 1949 को भारतीय संविधान ने देवनागिरी लिपि में लिखी गई हिंदी भाषा को अखंड भारत की प्रशासनिक भाषा के रूप में स्वीकार किय था। प्रत्एक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। हिंदी विश्व की करीब 3,000 भाषाओं में से एक है। कहने को हिंदी हमारी मातृभाषा है मगर जब प्रतियोगिता के दौर में हिंदी की तुलना की जाती है तो कहीं न कहीं यह अंग्रेजी भाषा से कमतर ही नजर आती है। आज भले ही स्कूल कॉलेज के किसी आयोजन में हिंदी  दिवस के उपलक्ष में कार्यक्रम किए जाते हों मगर जब बात बोलचाल और पढ़ाई की आती है तो अंग्रेजी भाषा को ही प्राथमिकता दी जाती है। इसी तरह युवाओं के बीच हिंदी से ज्याद अंग्रेजी भाषा ही लोकप्रिय होती जा रही है। यही कारण है कि हिंदी भाषा के संरक्षण पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। 

1 टिप्पणी:

  1. अपनी धाक खोने में हमारा ही हाथ है। धाक तो धाक जमाने से शायद जमेगी। कुछ एेसी ही एक मुहिम की मेरी एक छोटी सी कोशिश जारी है।

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