शुक्रवार, 28 जून 2013

सूफी संतों की भूमि खुल्दाबाद ...




महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित खुल्दाबाद एक एतिहासिक स्थान है यह दौलताबाद से 14 मील की दूरी पर पश्चिम में स्थित है। इस नगर को सूफी संतों की भूमि भी कहा जाता है।2,732 फुट की ऊंचाई पर बसा है। खुल्दाबाद में कई मुगल शासको की कब्रें हैं। औरंगजेब के साथ उसके पुत्र आजमशाह, आसफशाह, हैदराबाद के संस्थापक नासिरजंग, निजामशाह आदि बादशाहों की कब्रें भी इसी स्थान पर हैं। पहले इस नगर का नाम रौजा था लेकिन औरंगजेब की मृत्य के बाद इस स्थान का नाम खुल्दाबाद पड़ा क्योंकि औरंगजेब को खुल्दमकान भी कहा जाता है। यह स्थान स्वास्थ्य लाभ के लिए भी प्रसिद्ध है।

औरंगजेब का मकबरा

अबुल मुजफ्फर मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब आलमगीर (4 नवम्बर 1618 - 3 मार्च 1707) जिसे आमतौर पर औरंगजेब या आलमगीर (स्वंय को दिया हुआ शाही नाम  अर्थ होता है विश्व विजेता) के नाम से जाना जाता था भारत पर राज्य करने वाला छठा मुगल शासक थो उसका शासन 1659 से लेकर 1707 में उसकी मृत्यु होने तक शासन किया।  इतिहास में औरंगजेब का चित्रण एक रूढिवादी असहिष्णु और कट्टरवादी बादशाह के रूप मे चित्रित किया गया है लेकिन ऐसा नहीं है 50 वर्षों तक अपनी अटल हुकूमत करने वाला औरंगजेब असल में जालिम व क्रूर बादशाह नहीं था। औरंगजेब का जीवन बहुत ही सादा था उसने अपने खजाने को कभी भी अपने लिए इस्तेमाल नहीं किया। वह खजाने पर जनता का हक मानता था तथा उसे जनता की अमानत समझता था। औरंगजेब को विलासिता का जीवन कभी रास नहीं आया इसलिए गद्दी पर बैठते ही उसने दरबार से गायक नृतक व संगीतज्ञों को निकाल दिया था। उसने सुबह राजा के दर्शन और आशीर्वाद प्रथा को भी खत्म किया। दरबार के विलासिता के खर्च में कमी की तथा हजारों दास दासियों की संख्या में भी कटौती की। औरंगजेब अपने राज्यकोष के पैसे से एक निवाला भी नही खाता था बल्कि वह टोपियां बुनकर उन्हें बेचने के लिए देता था। सूफी प्रवचन करता था, संगीत वाद्यय यंत्र बजाकर कुरान की आयतें दूसरी भाषाओं में लिखकर जो भी कमाई करता था उसी से अपना खर्च निकालता था। अपने पिता शाहजहां से भी यही कहा कि आपने खजाने का दुरूपयोग किया है  कारण उसने शहाजहां को कैद में रखा।
औरंगजेब के शासन के अंतिम समय में दक्षिण में मराठों का जोर बढ़ÞÞ गया था। जिनसे निपटने में सेना को सफलता नहीं मिल रही थी। इसलिए सन 1683 में औरंगजेब स्वयं सेना लेकर दक्षिण गया। वह राजधानी से दूर रहता हुआ, अपने शासन-काल के लगभग अंतिम 25 वर्ष तक उसी अभियान में रहा। 50 वर्ष तक शासन करने के बाद दक्षिण के अहमदनगर में 3 मार्च सन 1707 ई में उसकी मृत्यु  हो गई। मृत्यु से पहले औरंगजेब ने खुल्दाबाद के बाहरी छोर पर स्थित रौजा में अपने को दफनाने की इच्छा व्यक्त की थी।  मृत्यु के बाद दौलताबाद में स्थित फकीर बुरुहानुद्दीन की कब्र के अहाते में उसे दफना दिया गया।यहां स्थित औरंगजेब का मूल मकबरा बहुत ही सादगी से बनाया गया था जिसे बाद में अंगे्रजों व हैदराबाद के निजामों ने भव्य रूप दिया।

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