बुधवार, 2 अप्रैल 2014

कमबख्त, आसमानों तक उड़ान भरती है...

दिल किसी दर्जी सा दिन को टांकता जाता है,
 जिंदगी हर घड़ी को इम्तहान करती है।
मेरे सपनों को जमा करके उछाल न दे कोई,
 यही बात  मुझे मौत से ज्यादा परेशान करती है।
 कब तलक बांध के रखें, खयालों की जुल्फ को,
 कमबख्त, आसमानों तक उड़ान भरती है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जीमेल हुआ १० साल का - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. कब तलक बांध के रखें, खयालों की जुल्फ को,
    कमबख्त, आसमानों तक उड़ान भरती है।
    बहुत ही सही ... उत्‍कृष्‍ट लेखन के लिए आभार ।

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