शनिवार, 26 जुलाई 2014

बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही.......


वो कामयाब क्या हुए, इतरा रहे हैं यूं
जैसे कि उनके पांव के नीचे जमीं नहीं।

परवाने जल के मर गए, शमा न बुझ सकी
बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही।

हमने दिए जलाए थे इक इश्तियाक से
जल जाएगा शहर ही ये सोचा न था कभी।

फुरसत के लम्हे मांग के मसरूफियत से तुम,
आओ कि बेकरारी की आदत नहीं रही।

इजहार-ए-इश्क तुमको खफा कर न दे कहीं
ख्वाहिश ये आज भी मेरी दिल में ही रह गयी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. इजहार-ए-इश्क तुमको खफा कर न दे कहीं
    ख्वाहिश ये आज भी मेरी दिल में ही रह गयी..
    ऐसा ही होता है अक्सर ... पर भलाई कह देने में ही है ...

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  2. परवाने जल के मर गए, शमा न बुझ सकी
    बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही।
    बहुत सुन्दर ग़ज़ल

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