रविवार, 21 दिसंबर 2014

खिड़की से मेरी चांद.......

यूं ही नहीं आता फलक पर 
सुनहरा चांद,
 कोई है जो रोपता है
रोशनी का बीज क्षितिज के उस पार,
कोई है जो सींचता है,
हर रोज नियम के साथ,
बुनता है रेशा-रेशा
किरणों का कोई बांध,
तब
उभरता है अर्श पर
बनके आधा सा टुकड़ा चांद,
कोई है जो सिखाता है
अंगुली पकड़कर चलना इसे,
कोई है जो गोद में लेकर दिखाता है
दुनिया की राह,
कोई है जो दुलार देकर उसे
कायनात को सौंप देता है।

तभी तो हर दिशा में दौड़ता, मुस्कुराता,
अठखेलियां करता हुआ,
झांका करता है हर रोज,
खिड़की से मेरी चांद। 

                       -डिम्पल सिरोही

1 टिप्पणी:

  1. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

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