शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

सेल्फ पॉट्रेट....

वो सांवली सी लड़की........
 मिलती है आसमां की उड़ान में सदा
 उसे कहो उतर जरा जमीं से पांव लगाए कभी।
वो चुपचाप सी लड़की.........
बोलती है, मगर एहसास को लफ्जों में पिरोकर
गाती है चमकती आंखों से, अनसुना सा गीत कोई
देखूं चेहरा अगर  पर्दा-ए-खामोशी गिराए कभी।
वो परेशान सी लड़की...........
लपेटे आती है ख्वाहिशों को जुल्फ में कैद किए
वो कांच की परीवश है कि छूते ही न चटख जाए कहीं
मचलती है कि फिर संभलती है दिल की तरह
किसी अकेली शाम में सोचती हूं उसे कॉफी पे बुला लूं।
 पूछूं हाल-ए-दिल मुझको सुनाए कभी।
 वो सांवली सी लड़की........।

शनिवार, 23 मई 2015

भलाई...................

मुझे मालूम नहीं था कि यह नो पर्किंग जोन है, बस कार पार्क की और उतरकर चल दी। कुछ देर बाद लौटी, तो एक पुलिस वाला कार पर कुहनी गढ़ाए शायद मेरे ही आने का इंतजार कर रहा था। मैं उसे देखकर थोड़ा सहमी, लेकिन सामान्य होकर गाड़ी के करीब पहुंची।
 मैडम जी गाड्डी आप ही की है के.....? , पुलिसवाले ने देहाती लहजे में पूछा .
जी हां, है तो मेरी ही, लेकिन क्या तकलीफ दे रही है?
गाड्डी 'नो पार्किंग' में खड़ी है, चालान बनेगा रॉन्ग पर्किंग का। साढ़े चारसौ रुपए भरने पडयेंगे जुर्माने के तुरंत।
मैनें अचंभित होकर कहा, क्या.......? अरे मुझे सच में नहीं पता था कि ये नो पार्किंग जोन है और यहां कौन सा बोर्ड लगा है, जिस पर ये लिखा हो कि यहां कार पार्किंग मना है?
मैड्म पढ़ी-लिखी होके भी बहस कर रही हो। इब जल्दी से जुर्माना भर दो।
पढ़ी-लिखी हूं तब ही बहस कर रही हूं, लेकिन आपको बता दूं कि मैं एक भली लड़की हूं और भले परिवार से ताल्लुक रखती हूं। खुद भी ईमानदारी से काम करती हूं और दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करती हूं। मुझे मालूम होता, तो मैं यहां गाड़ी बिल्कुल न पार्क करती ।
पुलिसमैंन ने कहा- भले आदमी तो हम भी बहुत है और भले लोगों की हमेशा मदद किया करते हैं। ईमानदारी और भलाई के लिए अक्सर हमें ईनाम भी मिलते रहते हैं।
मुझे इस पर हंसी आई और मैनें सौ रुपए पर्स से निकाल कर कार पर रखी उसकी हथेली के नीचे सरका दिए और कहा- तभी तो महकमे को आप जैसे लोगों पर बहुत गर्व है। पुलिसमैन ने मुटठी बंद की, नोट को जेब में ठूंसा और बोला, मैड्म जी अगर दुनिया में सब आपकी तरह भले हो जाएं, तो हमें कोई शौक थोड़े ही है चालान बनाने का।  -डिम्पल सिरोही

शनिवार, 9 मई 2015

'दिल' 'ख्वाहिशों का कारखाना' था

न आह न आहट
न हलचल, न सांस, न जुंबिश
कितना जिद्दी है बदन उसका
सख्त हथौड़े से पैनी कैंची से
खोली जा रही हैं उसके जिस्म की परतें।
बड़ी बेतरतीब सी दुनिया,
 उसके सीने से बाहर निकली है।
किसी रोशनदान से झांकते
धूप के टुकड़े की आंख में कुछ नमी सी है।
बस इक हवा है जो कभी बेजान होठों से टकराकर
कभी सिसकियां तो कभी आह भरती है।
सूखे खून की कुछ वजहें फर्श पर
उभरी हैं एक एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग की तरह,
ेएक पहली से तन को सुलझाने में और भी
उलझ गए हैं औजार,
कठोर हाथों से दस्ताने उतारते हुए
एक धीमी आवाज कहती है
और कुछ भी नहीं , उस जिस्म की
बेड़ियों में बंधा 'दिल' 'ख्वाहिशों का कारखाना' था। - डिम्पल सिरोही-

गुरुवार, 7 मई 2015

ये इत्तेफाक हैं कि मेरे साथ सफर करने आएं हैं...........

कितने किस्से, कितने वाकये ,
 कितने हादसे
 मेरे जीने की खुशी  में
शिरकत करने आएं हैं।
 कुछ सिर झुकाए हैं
 कुछ सिर उठाएं हैं
 कुछ कातिल हैं
कुछ कत्ल करने आएं हैं
छोड़ चली थी इत्तेफाक के शहर में
कुछ ख्वाहिशें
 ये  इत्तेफाक हैं कि मेरे
साथ सफर करने आएं हैं। - डिम्पल सिरोही

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

कितनी ही गज़लें उलझी हैं......

Dedicated to All the Beautiful Womens of the World.....

कितनी ही गज़लें उलझी हैं तेरे मुलायम बालों पर,
 अटके हैं कितने ही सानी, मिसरे तेरे गालों पर।
 सुरमई रातों, में टपके थे, लफ्ज़ कभी तेरे लब से,
 जुगनूं के मानिंद फिरें हैं, हरसू मेरे खयालों पर।
  याद भी करना भूल गए तुम, याद भी आना भूल गए,
जंग कहीं, लग जाए न इक दिन, इन यादों के तालों पर।
सूरज की पहली किरणों पर, मोती जैसी चमके हैं,
 तेरे कंगन के मोती या, औंस की बूंदें जालों पर।
 दर्द से वो, घबरा जाता है, पूछ न लें कहीं हाले दिल,
 फफ़क के हमदम रो जाएगा, इतने सख़्त सवालों पर।
कितनी ही गज़ले उलझी हैं, तेरे मुलायम बालों पर।
 अटके हैं कितने ही सानी, मिसरे तेरे गालों पर।  -डिम्पल सिरोही