शनिवार, 9 मई 2015

'दिल' 'ख्वाहिशों का कारखाना' था

न आह न आहट
न हलचल, न सांस, न जुंबिश
कितना जिद्दी है बदन उसका
सख्त हथौड़े से पैनी कैंची से
खोली जा रही हैं उसके जिस्म की परतें।
बड़ी बेतरतीब सी दुनिया,
 उसके सीने से बाहर निकली है।
किसी रोशनदान से झांकते
धूप के टुकड़े की आंख में कुछ नमी सी है।
बस इक हवा है जो कभी बेजान होठों से टकराकर
कभी सिसकियां तो कभी आह भरती है।
सूखे खून की कुछ वजहें फर्श पर
उभरी हैं एक एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग की तरह,
ेएक पहली से तन को सुलझाने में और भी
उलझ गए हैं औजार,
कठोर हाथों से दस्ताने उतारते हुए
एक धीमी आवाज कहती है
और कुछ भी नहीं , उस जिस्म की
बेड़ियों में बंधा 'दिल' 'ख्वाहिशों का कारखाना' था। - डिम्पल सिरोही-

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